- Rajesh sharma
आंदोलन लोकतंत्र का आधार
विशेष संपादकीय
राजेश शर्मा
बांधवभूमि, न्यूज
मध्यप्रदेश
उमरिया। आजादी के बाद देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू से जब पूछा गया कि वे भारत मे तरह-तरह के कल-कारखाने और खनिज खदानें क्यों खोल रहे हैं। जबकि विदेशों से आकर यही सामान काफी सस्ता उपलब्ध हो सकता है, तब उन्होंने कहा था कि फिर हमारे युवा कहां जायेंगे। पं. नेहरू ने ही आधुनिक भारत की मजबूत नीव रखी। उनके शासनकाल मे शिक्षा, स्वास्थ्य, विज्ञान, उद्योग, आर्थिक विकास और अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र मे कई महत्वपूर्ण संस्थान बने। 1950 मे प्लानिंग कमीशन का गठन और पंचवर्षीय योजनाओं की शुरुआत के साथ ही तकनीकी शिक्षा को बढ़ावा देने के लिये 1951 मे भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान खड़गपुर तथा उसके बाद मुंबई, मद्रास, कानपुर तथा दिल्ली मे भी ऐसे ही संगठन खडे किये गये।
1956 मे अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, नई दिल्ली की स्थापना हुई। विज्ञान और परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र मे आत्मनिर्भता हांसिल करने 1948 में परमाणु ऊर्जा आयोग, 1954 मे परमाणु ऊर्जा विभाग के अलावा परमाणु अनुसंधान के उत्थान हेतु भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र की बुनियाद रखी गई। सरकार ने औद्योगिक क्रांति को गति देने के लिये भिलाई, राउरकेला और दुर्गापुर जैसे बड़े-बड़े इस्पात संयंत्र शुरू किये। इसके अलावा हिंदुस्तान मशीन टूल्स, इंडियन टेलीफोन इंडस्ट्रीज जैसी सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां भी खोली गईं।
अंतरिक्ष विज्ञान मे ऊंची उडान के लिये 1962 मे भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष अनुसंधान समिति का गठन किया गया। पं. नेहरू के कार्यकाल मे शिक्षा, चिकित्सा, विज्ञान, भारी उद्योग, परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र मे ऐसे संस्थानों की आधारशिला रखी गई, जिन्होंने उन्नति के आयाम खोल दिये। इन कदमो से जहां भारत का गौरव बढा, विकास को एक नई गति मिली। वहीं लाखों रोजगारों का सृजन भी होने लगा।
बहुत पुरानी कहावत है कि खाली दिमाग व्याधियों का घर होता है और व्यस्तता कई तरह की समस्याओं का सटीक हल है। उत्पीडन से ही विद्रोह पनपता है। कोई भी शासक जब यह भूल जाता है, तभी दिक्कतें पैदा होने लगती हैं। भारत जैसा देश जिसकी आबादी 150 करोड से भी अधिक हो, वहां सर्वाधिक रोजगार उत्पन्न करने वाली कंपनियां और संस्थान कार्पोरेट्स के हाथों मे कौडियों के भाव बेंचे जांय, यह दुर्भाग्वपूर्ण है। निजीकरण का भूत हर साल लाखों नौकरियां लील रहा है। हजारों कर्मचारियों के जरिये बाजारों तक पहुंचने पैसा एक या दो धन्नासेठों कीे तिजोरियां भर रहा है। देश मे लाखों पद खाली पडे हैं। स्वरोजगार योजनाओं पर ताला लग गया है। ऊपर से कभी-कभार निकलने वाली नौकरियां भी योग्यता को न मिल कर भ्रष्टाचार की भेंट चढ रही हैं। रही सही कसर राष्ट्रीय पात्रता परीक्षाओं मे बार-बार हो रही पेपर लीक जैसी गफलत पूरी कर रहीं हैं। अब युवा करें भी तो क्या।
हाल ही मे जंतर-मंतर पर हुआ चर्चित जन प्रदर्शन केवल नीट-यूजी पेपर लीक की परिणीति नहीं है। दरअसल यह बेरोजगारी से उपजे आक्रोष का परिणाम है। इसे किसी राजनैतिक दल या पाकिस्तान का षडयंत्र साबित करने से काम नहीं चलेगा। नां ही सरकारी लाठी भांजने से समस्या खत्म हो जायेगी। सही मायने मे आंदोलन ही लोकतंत्र का आधार है। सब को यह स्वीकार करना होगा कि बेकारी एक अभिशाप है, यदि इसका हल जल्दी नहीं खोजा गया तो हालात बद से बदतर होते चले जायेंगे। केवल स्वदेशी का नारा देना पर्याप्त नहीं है। सरकारों को इसकी जडें काटने की दृढता भी दिखानी होगी। बंजर हो चुकी आत्मनिर्भरता को फिर से सींच कर हरा-भरा करना होगा। स्वार्थ की छाया मे पल रहे निजीकरण के दानव का वध करके उसी नीति को फिर से अपनाना होगा, जिसने देश को विश्व का सिरमौर बनने का मार्ग प्रशस्त किया था।
आजादी की 79वीं वर्षगांठ पर आईये हम सभी राष्ट्र प्रथम की भावना को आत्मसात करते हुए, सारे मतभेद भुलाकर भारत को दुनिया का सर्वश्रेष्ठ राष्ट्र बनाने का संकल्प लें।
स्वतंत्रता दिवस की कोटिश: बधाई, जय हिंद।